Little Pieces of Poetry Poems by Gulraj Singh Bedi

I

लफ्ज़ खाली हैं, बेवजह
जैसे आसमान बिना अब्र के
यूं तोह पास ही रहते हैं दोनों
जैसे दर्द और तन्हाई
जैसे गिला और रुस्वाई
जैसे आग और जलन
जैसे सांस और जिस्म

लेकिन यह वक़्त ही पेचीदा है
इसलिए लफ्ज़ हैं, पर बेवजह|

 

II

मैं गुज़ारना चाहूँ
तुम्ही से होक
फिरर तेरी ही राहें
मुझे क्यों रोकें

नींद की तरह
ख्वाब दिखाने
तुझसे मिलने
किसी बहाने|

 

A Little About Gulraj Singh Bedi

 

 

 

 

 

An avid cricket fan with a keen interest in everyday politics, Gulraj reserves a special soft corner for poetry. Shayari and bits of Urdu language is his favorite. Currently pursuing PhD, the man is also a hopeless romantic.

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Photo by Sweet Ice Cream Photography on Unsplash

3 comments

  1. मेरी नज़रों से एक दफा फिर से चूक होती
    तुझसे इश्क़ हो जाता और दिल में हूक होती

    टहलता बगीचों में तुझसे बातें करता हुआ
    तेरी आवाज़ मानो कोयल की कूक होती

    फैलने लगती आतिश-ए-इश्क़ सीने में
    वो आग फैलाती तेरे लबों की फूंक होती

    सजाता ख्वाबों में कोई कहानिओं की दुनिया
    तू फिर चली जाती, फिर महफ़िल मतरूक होती

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